सार्वजनिक स्थल पर पिस्तौल के साथ फोटो खिंचवाना और उसे फेसबुक पर अपलोड
करना दो व्यक्तियों को महंगा पड़ सकता है। उनके खिलाफ दाखिल शिकायतपत्र को
गंभीरता से लेते हुए सत्र अदालत ने निचली अदालत को मामले की सुनवाई
प्राथमिकता के आधार पर करने के निर्देश दिए हैं।
तीस हजारी स्थित विशेष न्यायाधीश नरेन्द्र कुमार की अदालत ने इस मामले में शिकायतकर्ता के पक्ष को सुनते हुए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत को कहा है कि वह मामले में नवंबर 2018 की बजाए अक्तूबर में ही सुनवाई शुरू करें। साथ ही, सत्र अदालत ने कहा है कि आरोप गंभीर हैं। शिकायतकर्ता इस मामले में साक्ष्य पेश करना चाहता है तो उसे मौका दिया जाए। सत्र अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पिस्तौल अगर लाइसेंसी नहीं है तो इसे शो-पीस की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। लिहाजा, ऐसे मसलों को गंभीरता से लिया जाए और सुना जाए।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत मनचंदा के अनुसार, सोशल साइट पर किसी भी ऐसी
सामग्री और आपत्तिजनक तस्वीर को अपलोड नहीं कर सकते जोकि समाज में गलत
संदेश दे। इसके लिए कानून में अलग-अलग प्रावधान है। .
पुलिस ने बताया टॉयगन
मामले में पुलिस ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में याचिका दायर कर कहा है कि इस घटना को लेकर चार लोगों की गवाही ली गई थी। सभी ने इस बात से इनकार किया है कि फोटो में दिख रही पिस्तौल असली है। उन्होंने कहा है कि यह टॉयगन थी जिसे बंदरों को भगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पुलिस रिपोर्ट के आधार पर ही मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत ने शिकायत को खारिज कर दिया था। मगर, शिकायतकर्ता इस मामले में अपने गवाह पेश करना चाहता है। साथ ही, उसने फेसबुक से संबंधित तस्वीर का डाटा तलब करने की मांग की है। अब इसी मांग को लेकर वह सत्र अदालत पहुंचा है।
पुलिस के पास फेसबुक से साक्ष्य सुरक्षित करवाने का अधिकार
इस मामले में शिकायतकर्ता वरुण ने सत्र अदालत में दलील पेश की है कि इस पूरे मामले को सही साबित करने के लिए फेसबुक से साक्ष्य सुरक्षित करवाने का अधिकार पुलिस के पास है। इसके लिए अदालत ही पुलिस को यह निर्देश दे सकती है। लिहाजा, सत्र अदालत निचली अदालत को उसकी अर्जी पर तुरंत निर्णय का आदेश दे। सत्र अदालत ने भी इस दलील को सही माना है। सत्र अदालत ने कहा है कि सोशल साइट पर इस तरह के साक्ष्य अमूमन एक साल तक सुरक्षित रहते हैं। चूंकि यह विवादित तस्वीर 31 दिसंबर 2017 को फेसबुक पर अपलोड की गई थी, इसलिए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत को इसी महीने में इस याचिका पर सुनवाई पूरी करने को कहा गया है।

तीस हजारी स्थित विशेष न्यायाधीश नरेन्द्र कुमार की अदालत ने इस मामले में शिकायतकर्ता के पक्ष को सुनते हुए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत को कहा है कि वह मामले में नवंबर 2018 की बजाए अक्तूबर में ही सुनवाई शुरू करें। साथ ही, सत्र अदालत ने कहा है कि आरोप गंभीर हैं। शिकायतकर्ता इस मामले में साक्ष्य पेश करना चाहता है तो उसे मौका दिया जाए। सत्र अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पिस्तौल अगर लाइसेंसी नहीं है तो इसे शो-पीस की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। लिहाजा, ऐसे मसलों को गंभीरता से लिया जाए और सुना जाए।
पुलिस ने बताया टॉयगन
मामले में पुलिस ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में याचिका दायर कर कहा है कि इस घटना को लेकर चार लोगों की गवाही ली गई थी। सभी ने इस बात से इनकार किया है कि फोटो में दिख रही पिस्तौल असली है। उन्होंने कहा है कि यह टॉयगन थी जिसे बंदरों को भगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पुलिस रिपोर्ट के आधार पर ही मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत ने शिकायत को खारिज कर दिया था। मगर, शिकायतकर्ता इस मामले में अपने गवाह पेश करना चाहता है। साथ ही, उसने फेसबुक से संबंधित तस्वीर का डाटा तलब करने की मांग की है। अब इसी मांग को लेकर वह सत्र अदालत पहुंचा है।
पुलिस के पास फेसबुक से साक्ष्य सुरक्षित करवाने का अधिकार
इस मामले में शिकायतकर्ता वरुण ने सत्र अदालत में दलील पेश की है कि इस पूरे मामले को सही साबित करने के लिए फेसबुक से साक्ष्य सुरक्षित करवाने का अधिकार पुलिस के पास है। इसके लिए अदालत ही पुलिस को यह निर्देश दे सकती है। लिहाजा, सत्र अदालत निचली अदालत को उसकी अर्जी पर तुरंत निर्णय का आदेश दे। सत्र अदालत ने भी इस दलील को सही माना है। सत्र अदालत ने कहा है कि सोशल साइट पर इस तरह के साक्ष्य अमूमन एक साल तक सुरक्षित रहते हैं। चूंकि यह विवादित तस्वीर 31 दिसंबर 2017 को फेसबुक पर अपलोड की गई थी, इसलिए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत को इसी महीने में इस याचिका पर सुनवाई पूरी करने को कहा गया है।

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