उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे कांधला में जन्मे जीडी अग्रवाल का आईआईटी
प्रोफेसर से गंगा का सिपाही संत स्वामी सानंद बनने का सफर किसी परीकथा से
कम नहीं। रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग के स्नातक अग्रवाल
ऐशोआराम की नौकरी छोड़कर गंगा के पुनर्जीवन के लिए पूरी तरह से समर्पित हो
गए थे।
40 साल से अधिक समय से स्वामी सानंद के संपर्क में रहे पर्यावरण कार्यकर्ता रवि चोपड़ा बताते हैं कि रुड़की इंजीनिरिग कालेज के सिविल इंजीनियर सानंद ने अपने करियर की शुरूआत 1950 में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग से की। कुछ समय तक नौकरी करने के बाद वो उच्च शिक्षा के लिए आईआईटी कानपुर चले गए। विदेश से पीएचडी करने के बाद लौटने के बाद वो कानपुर आईआईटी में सेवाएं देने लगे।
IIT में एचओडी के पद से इस्तीफा
वर्ष 1977 में वरिष्ठ राजनीतिक जयप्रकाश नारायण को आईआईटी में बुलाने की वजह से हुए विवाद के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उस वक्त वो कानपुर आईआईटी में डीन ऑफ फैकल्टी और इंवायरमेंट इंजीनियरिंग विभाग के एचओडी भी थे। इसके बाद उनके जीवन की राह बदल गई और वो कानपुर से वो दिल्ली चले गए।
प्रदूषण की जांच करने वाले उपकरण भी बनाए
1970-80 के दौरान में वो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में सदस्य सचिव के रूप में सेवा शुरू की। मगर, अचानक ही उनका मन पलटा और कुछ ही साल बाद वहां से इस्तीफा देकर अपने गांव आ गए। रवि चोपड़ा बताते हैं पर्यावरण से जुड़ी संस्थाओं के साथ मिलकर उन्होंने प्रदूषण की जांच करने वाले उपकरण भी बनाए। उन्होंने बताया कि कुछ समय चित्रकूट स्थित महात्मा गांधी ग्रामीण विश्वविद्यालय में सेवाएं देने के बाद जीडी अग्रवाल वर्ष 2008 में पूरी तरह से गंगा के पुनर्जीविनीकरण अभियान से जुड़ गए। गंगा संरक्षण के लिए अब तक उन्होंने पांच उपवास किए। यह उनका सबसे लंबी और अंतिम तपस्या थी।
‘सरकार के मुताबिक विचार न बदलें वैज्ञानिक-इंजीनियर’
स्वामी सानंद के साथ बिताए क्षणों का उल्लेख करते हुए रवि चोपड़ा बताते हैं कि उन्हें वर्तमान दौर में वैज्ञानिक और इंजीनियरों का राजनीतिक दबाव में काम करना पसंद नहीं था। एक बार चर्चा के दौरान उन्होंने व्यथित मन से कहा था कि आज की इस मेधा में वो ईमानदारी नहीं है। अब ये लोग सरकार की इच्छाओं के अनुसार अपने दिमाग और विचार बदल लेते हैं। रवि बताते हैं कि एक बार उन्होंने कहा था कि आज विकास को भौतिकता और भोग के पैमाने से नापा जाता है। यह गलत है। विकास में भोगवाद की तलाश से पर्यावरण सुरक्षित नहीं रह सकता है।

40 साल से अधिक समय से स्वामी सानंद के संपर्क में रहे पर्यावरण कार्यकर्ता रवि चोपड़ा बताते हैं कि रुड़की इंजीनिरिग कालेज के सिविल इंजीनियर सानंद ने अपने करियर की शुरूआत 1950 में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग से की। कुछ समय तक नौकरी करने के बाद वो उच्च शिक्षा के लिए आईआईटी कानपुर चले गए। विदेश से पीएचडी करने के बाद लौटने के बाद वो कानपुर आईआईटी में सेवाएं देने लगे।
IIT में एचओडी के पद से इस्तीफा
वर्ष 1977 में वरिष्ठ राजनीतिक जयप्रकाश नारायण को आईआईटी में बुलाने की वजह से हुए विवाद के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उस वक्त वो कानपुर आईआईटी में डीन ऑफ फैकल्टी और इंवायरमेंट इंजीनियरिंग विभाग के एचओडी भी थे। इसके बाद उनके जीवन की राह बदल गई और वो कानपुर से वो दिल्ली चले गए।
1970-80 के दौरान में वो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में सदस्य सचिव के रूप में सेवा शुरू की। मगर, अचानक ही उनका मन पलटा और कुछ ही साल बाद वहां से इस्तीफा देकर अपने गांव आ गए। रवि चोपड़ा बताते हैं पर्यावरण से जुड़ी संस्थाओं के साथ मिलकर उन्होंने प्रदूषण की जांच करने वाले उपकरण भी बनाए। उन्होंने बताया कि कुछ समय चित्रकूट स्थित महात्मा गांधी ग्रामीण विश्वविद्यालय में सेवाएं देने के बाद जीडी अग्रवाल वर्ष 2008 में पूरी तरह से गंगा के पुनर्जीविनीकरण अभियान से जुड़ गए। गंगा संरक्षण के लिए अब तक उन्होंने पांच उपवास किए। यह उनका सबसे लंबी और अंतिम तपस्या थी।
‘सरकार के मुताबिक विचार न बदलें वैज्ञानिक-इंजीनियर’
स्वामी सानंद के साथ बिताए क्षणों का उल्लेख करते हुए रवि चोपड़ा बताते हैं कि उन्हें वर्तमान दौर में वैज्ञानिक और इंजीनियरों का राजनीतिक दबाव में काम करना पसंद नहीं था। एक बार चर्चा के दौरान उन्होंने व्यथित मन से कहा था कि आज की इस मेधा में वो ईमानदारी नहीं है। अब ये लोग सरकार की इच्छाओं के अनुसार अपने दिमाग और विचार बदल लेते हैं। रवि बताते हैं कि एक बार उन्होंने कहा था कि आज विकास को भौतिकता और भोग के पैमाने से नापा जाता है। यह गलत है। विकास में भोगवाद की तलाश से पर्यावरण सुरक्षित नहीं रह सकता है।

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