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मीडिया में चलाए जा रहे हैं मीटू कैंपेन पर महिलाओं द्वारा की जा रही यौन
उत्पीड़न की शिकायतों का कानून में कोई महत्व नहीं है। कानून की मशीनरी तभी
सक्रिय होगी जब पीड़ित इसकी औपचारिक शिकायत पुलिस में करेगी। अन्यथा आरोप
लगाने वाली पीड़ित गंभीर रूप से उस व्यक्ति की मानहानि के दायरे में रहेगी
जिस पर उसने आरोप लगाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ क्रिमिनल वकील
डॉक्टर हर्षवीर शर्मा ने कहा कि यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराने पर ही
कुछ कार्रवाई हो सकती है। ये शिकायत आईपीसी की धारा 354 (सम्मान से छेड़छाड़,
बेइज्जती) और धारा 376 के तहत दर्ज की जा सकती है। लेकिन पुलिस इस मामले
में गिरफ्तारी नहीं करेगी क्योंकि उसे पहले यह जानना होगा कि महिला इतने
दिन तक चुप क्यों रही।
ऐसे मामले जो कई साल पुराने हैं, उनमें
मेडिकल सबूत नहीं मिलेंगे। यदि उसके पास अन्य सबूत जैसे इलेक्ट्रानिक
साक्ष्य (मेल, वीडियो रिकॉर्डिंग, व्हाट्सएप संदेश आदि) उन्हें बता सकती
है। सबूत मिलने पर यह मामला कोर्ट में सिद्ध हो सकता है।
बयान ही काफी नहीं-
महिला के बयानों के आधार पर रेप आदि में दंडित करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर शर्मा ने कहा कि ये वे मामले थे जहां आरोप ताजा थे, सबूत मौजूद थे। लेकिन इन मामलों में महिला का बयान ही काफी नहीं होगा, सबूतों का होना आवश्यक है।
महिला के बयानों के आधार पर रेप आदि में दंडित करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर शर्मा ने कहा कि ये वे मामले थे जहां आरोप ताजा थे, सबूत मौजूद थे। लेकिन इन मामलों में महिला का बयान ही काफी नहीं होगा, सबूतों का होना आवश्यक है।
पुरुषों के लिए विकल्प-
पुरुष आरोप लगाने वाली पर आपराधिक तथा दीवानी मानहानि और धारा 469 के तहत झूठे दस्तावेज बनाना तथा झूठ फैलाने का मामला दायर कर सकता है।
पुरुष आरोप लगाने वाली पर आपराधिक तथा दीवानी मानहानि और धारा 469 के तहत झूठे दस्तावेज बनाना तथा झूठ फैलाने का मामला दायर कर सकता है।

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